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Wednesday 16th of August 2017
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एक हतोत्साहित व्यक्ति

कभी कभी हमारे जीवन में ऐसी घटनाएं घटती हैं कि जो जाने अन्जाने हमारी भावनाओं को उक्साने का कारण बनती हैं। इनमें से एक, कि जिसका सहन करना अत्यन्त कठिन होता है, हतोत्साह नामक स्थिति है। एकहतोत्साहित व्यक्ति बहुत ही सुस्त हो जाता है, उसे प्रसन्नता का आभास नहीं होता, वो समझता है कि अपने कार्यों के लिए उसके शरीर में पर्याप्त ऊर्जा नहीं है, वो थका थका सा और उद्देश्य हीन है, उसके हाथ - पैर शिथिल पड़े हुए हैं, उसे घुटन और घबराहट का आभास होता है, वो समझता है कि अपनी शक्ति और इरादा रखो चुका है, दूसरों के साथ मिलने जुलने पर उसे आनन्द प्राप्त नहीं होता और पहले यदि उसे कोई भोजन अच्छा लगता था, अब उसको खाने का मन नहीं करता या पहले यदि मित्रों के बीच और समोरोहों आदि में उसे आनंद आता था, तो अब उससे भागता है और अकेलापन उसे अच्छा लगता है। क्योंकि वो समझता है कि दूसरे आलोचना योग्य है।

यदि आप भी इस प्रकार के लक्षण देखें तो समझ लीजिए कि एक प्रकार के हतोत्साह का सामना हो सकता है। ऐसी स्थिति को यदि इसे बढ़ने की अनुमति दी गई तो आप को हतोत्साह की सीमाओं तक पहुंचा देगी। अब हमें ये देखना है कि इस स्थिति से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए। सबसे पहले हमें स्वंय को यह विश्वास दिलवाना चाहिए कि सभी चीज़ें हमारे विचारों और दृष्टिकोंणो पर निर्भर हैं।
किसी चीज़ को समझना, उसके बारे में दृष्टिकोण अपनाना और हमारे विश्वास निर्णयक भूमिका निमाते हैं। महत्वपूर्ण ये है कि हम घटनाओं का मूल्यांकन किस प्रकार करते हैं और प्रितिदन अपने चारों ओर की घटनाओं , लोगों और विभिन्न चीज़ों को किस द्वुष्टि से देखते है।

यदि इस बात को हम और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहना चाहें तो कहें गे कि इस प्रकार के विचार और दृष्टिकोंण, कि जो हमारे जीवन शैली का निर्धारण करते हैं और कारण बनते हैं कि हम जीवन के सुख - दुख को ईश्वर की ओर से एक वरदान समझें या ये कि एक सादी और छोटी सी घटना को अपने लिए एक बड़ी और असहनीय त्रासदी बना लें।

इस आधार पर नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक रुप में परिवर्तित करना एक निर्णयक मापदण्ड समझा जाता है। हतोत्साह की हालत में मनुष्य की भावनाओं पर एक गहरा नकारात्मक दबाव रहता है और इससे मनुष्य न केवल ये कि अपनी गतिविधियों, कार्यों, विचारों और अस्तित्व को मूल्यहीन और नकारात्मक समझता है बल्कि संसार को भी एक भयानक, अंधेरा और ख़तरनाक स्थान समझने लगता है।

यद्यपि यह नकारात्मक भावनाएं लगभग सदैव ही निराधार हैं, परन्तु चूंकि यह भावनात्मक अनियमितताओं और नकारात्मक विचारों का कारण बनती हैं इसलिए उपचार करते समय इनपर ध्यान दिया जाता है।
यदि हम यह मान लें कि हमारे विचार हमारे जीवन को सुखी या दुखी बनाते हैं तो हम अपने सोचने की पद्धति में परिवर्तन करके, बिना भौतिक साधनों में परिवर्तन के ही सुख और कल्याण का आभास कर सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि अपनी कमियों का ही रोना रोते रहें। यदि हम ईश्वर के वरदानों और उपकारों पर विचार करें और दिल की गहराइयों से सोचें कि यदि यह चीज़ें हमें न मिली होती तो हम क्या करते? हमें चाहिए कि इन वरदानों के मूल्य और महत्व को समझें और अपनी भौतिक कमियों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर स्वंम को परेशानी के जाल में न फसाएं।

ईरान के विख्यात कवि सादी की गुलिस्तान में एक स्थान पर आया है- एक दिन जूता न होने के कारण मैं बड़ा दुखी था कि अचानक मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसके पैर ही नहीं थे। उस समय मैंने ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त किया और अपने पास जूता न होने पर संतोष कर लिया। स्वास्थ्य उन बड़े वरदानों में से है जो ईश्वर ने हमें प्रदान किए हैं और यह हमारे इतने निकट और सामने है कि इसका मूल्य हम नहीं समझ पाते और जब थोड़ी सी अवधि के लिए भी हम स्वास्थ्य के एक छोटे से भाग को भी गंवा देते हैं तब हमारी समझ में आता है कि ईश्वर के कितने बड़े उपहार से वंचित हो गए हैं।
वही समय है कि जब हम यह सोचते हैं कि काश हमारे पास सांसारिक पूंजी कुछ भी न होती परन्तु हमारा स्वास्थ्य बना रहता। यदि हम केवल अपने हाथ, पैरों, आंखों, नाक आदि पर ध्यान दें तो हमें पता चले गा कि ईश्वर ने हमें कितने वरदान दिए हैं और फिर छोटी छोटी बातों से हम परेशान नहीं होंगे।

अब हम यह देखने का प्रयास करें गे कि हतोत्साह की भावना की जड़ें कहां पर होती हैं। इसलिए स्थिति की क्षति पूर्ति और परिवर्तन के लिए नकारात्मक भावनाओं की जड़ों का पता लगाना चाहिए।
यह देखना चाहिए कि हतोत्साह और उदासीनता के समय कैसे विचार मन में आते हैं, क्योंकि यही विचार मनुष्य की असली परेशानी और दु:ख़ का कारण होते हैं जो घटना घटी और उसके प्रति आप के विचारों की शैली ने इस घटना को दु:ख़दाई समझा है। इन विचारों में परिवर्तन से आप की आन्तरिक भावनाओं में भी परिवर्तन आएगा। क्योंकि यह घटनाएं नहीं हैं कि जो परेशानी का कारण बनती हैं बल्कि घटना के प्रति जो हमारी कल्पना है वही हमारी स्थिति और आन्तरिक भावनाओं को प्रभावित करती है। बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि दु:ख़ की स्थिति में, घटनाओं को नकारात्मक, अप्रिय और उपेक्षित समझते हैं और ग्लास के केवल आधे ख़ाली भाग को ही देख पाते हैं और उसके भरे हुए भाग पर विचार नहीं कर पाते।

हमें चाहिए कि नकारात्मक तथ्यों को हम बढ़ा चढ़ा कर न देखें, हर व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की अप्रिय घटनाएं घटती हैं। यह हम हैं कि छोटी सी बात का बतँगड़ बना कर राई का पर्वत बना देते हैं यहां तक कि हर साद्यारण सी घटना को एक असहनीय सँकट के रुप में देखने लगते हैं। एक हतोत्साहित व्यक्ति किसी भी वस्तु का वास्तविक मूल्याँकन नहीं कर पाता और उसे अपनी इस आदत में परिवर्तन करना चाहिए। प्राय: हतोत्साहित व्यक्ति घटनाओं के प्रति किसी भी प्रकार की सन्तुलित राय नहीं रख पाता है।

हमें चाहिए कि कठिनाइयों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने और एक तरफ़ा मूल्याँकन से बचें। निर्णय लेने में जल्दी न करें। प्राय: घटनाओं के प्रति हतोत्साहित व्यक्तियों के विचार नकारात्मक और चिन्ताजनक होते हैं। अधिकतर ऐसा लगता है कि कोई दुर्घटना घटने वाली है। यदि कोई काम होने वाला है तो सदैव यही समझा जाता है कि इसका परिणाम नकारात्मक ही होगा।
हर कार्य से पहले ही नकारात्मक निष्कर्ष न निकालें। क्योंकि यदि कोई अप्रिय घटना घटती है तो हम अकारण ही स्वंम को उसका दोषी ठहराते हैं और अपनी अक्षमता को इस अप्रिय परिणाम का ज़िम्मेदार समझते हैं। तो इसलिए आज से निर्णय लेने में जल्दी करना और स्वंम को उसके लिए दोषी ठहराना वर्जित।

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