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पवित्र कुरआन - सूरह القيامة - جزء بيست و نهم - सूरह قيامت - सूरह انسان - पृष्ठ 578

पाठ सेटिंग्स
फ़ॉन्ट प्रकार
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القيامة 
सूरह انسان 
المرسلات 
كَلَّا بَلْ تُحِبُّونَ الْعَاجِلَةَ ٢٠ وَتَذَرُونَ الْآخِرَةَ ٢١ وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَاضِرَةٌ ٢٢ إِلَىٰ رَبِّهَا نَاظِرَةٌ ٢٣ وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ بَاسِرَةٌ ٢٤ تَظُنُّ أَنْ يُفْعَلَ بِهَا فَاقِرَةٌ ٢٥ كَلَّا إِذَا بَلَغَتِ التَّرَاقِيَ ٢٦ وَقِيلَ مَنْ ۜ رَاقٍ ٢٧ وَظَنَّ أَنَّهُ الْفِرَاقُ ٢٨ وَالْتَفَّتِ السَّاقُ بِالسَّاقِ ٢٩ إِلَىٰ رَبِّكَ يَوْمَئِذٍ الْمَسَاقُ ٣٠ فَلَا صَدَّقَ وَلَا صَلَّىٰ ٣١ وَلَٰكِنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ ٣٢ ثُمَّ ذَهَبَ إِلَىٰ أَهْلِهِ يَتَمَطَّىٰ ٣٣ أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰ ٣٤ ثُمَّ أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰ ٣٥ أَيَحْسَبُ الْإِنْسَانُ أَنْ يُتْرَكَ سُدًى ٣٦ أَلَمْ يَكُ نُطْفَةً مِنْ مَنِيٍّ يُمْنَىٰ ٣٧ ثُمَّ كَانَ عَلَقَةً فَخَلَقَ فَسَوَّىٰ ٣٨ فَجَعَلَ مِنْهُ الزَّوْجَيْنِ الذَّكَرَ وَالْأُنْثَىٰ ٣٩ أَلَيْسَ ذَٰلِكَ بِقَادِرٍ عَلَىٰ أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَىٰ ٤٠
بسم‌الله
هَلْ أَتَىٰ عَلَى الْإِنْسَانِ حِينٌ مِنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُنْ شَيْئًا مَذْكُورًا ١ إِنَّا خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ نُطْفَةٍ أَمْشَاجٍ نَبْتَلِيهِ فَجَعَلْنَاهُ سَمِيعًا بَصِيرًا ٢ إِنَّا هَدَيْنَاهُ السَّبِيلَ إِمَّا شَاكِرًا وَإِمَّا كَفُورًا ٣ إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ سَلَاسِلَ وَأَغْلَالًا وَسَعِيرًا ٤ إِنَّ الْأَبْرَارَ يَشْرَبُونَ مِنْ كَأْسٍ كَانَ مِزَاجُهَا كَافُورًا ٥
कुछ नहीं, बल्कि तुम लोग शीघ्र मिलनेवाली चीज़ (दुनिया) से प्रेम रखते हो, (20) और आख़िरत को छोड़ रहे हो (21) किनते ही चहरे उस दिन तरो ताज़ा और प्रफुल्लित होंगे, (22) अपने रब की ओर देख रहे होंगे। (23) और कितने ही चेहरे उस दिन उदास और बिगड़े हुए होंगे, (24) समझ रहे होंगे कि उनके साथ कमर तोड़ देनेवाला मामला किया जाएगा (25) कुछ नहीं, जब प्राण कंठ को आ लगेंगे, (26) और कहा जाएगा, "कौन है झाड़-फूँक करनेवाला?" (27) और वह समझ लेगा कि वह जुदाई (का समय) है (28) और पिंडली से पिंडली लिपट जाएगी, (29) तुम्हारे रब की ओर उस दिन प्रस्थान होगा (30) किन्तु उसने न तो सत्य माना और न नमाज़ अदा की, (31) लेकिन झुठलाया और मुँह मोड़ा, (32) फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की ओर चल दिया (33) अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है! (34) फिर अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है! (35) क्या मनुष्य समझता है कि वह यूँ ही स्वतंत्र छोड़ दिया जाएगा? (36) क्या वह केवल टपकाए हुए वीर्य की एक बूँद न था? (37) फिर वह रक्त की एक फुटकी हुआ, फिर अल्लाह ने उसे रूप दिया और उसके अंग-प्रत्यंग ठीक-ठाक किए (38) और उसकी दो जातियाँ बनाई - पुरुष और स्त्री (39) क्या उसे वह सामर्थ्य प्राप्त- नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे? (40) क्या मनुष्य पर काल-खंड का ऐसा समय भी बीता है कि वह कोई ऐसी चीज़ न था जिसका उल्लेख किया जाता? (1) हमने मनुष्य को एक मिश्रित वीर्य से पैदा किया, उसे उलटते-पलटते रहे, फिर हमने उसे सुनने और देखनेवाला बना दिया (2) हमने उसे मार्ग दिखाया, अब चाहे वह कृतज्ञ बने या अकृतज्ञ (3) हमने इनकार करनेवालों के लिए ज़जीरें और तौक़ और भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है (4) निश्चय ही वफ़ादार लोग ऐसे जाम से पिएँगे जिसमें काफ़ूर का मिश्रण होगा, (5)