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पवित्र कुरआन - सूरह الإخلاص - جزء سي ام - सूरह اخلاص - सूरह فلق - सूरह ناس - पृष्ठ 604

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المسد 
सूरह اخلاص  सूरह فلق  सूरह ناس 
 
بسم‌الله
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ١ اللَّهُ الصَّمَدُ ٢ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٣ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ ٤
بسم‌الله
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ ١ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ ٢ وَمِنْ شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ٣ وَمِنْ شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ ٤ وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ٥
بسم‌الله
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ١ مَلِكِ النَّاسِ ٢ إِلَٰهِ النَّاسِ ٣ مِنْ شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ ٤ الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ ٥ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ٦
कहो, "वह अल्लाह यकता है, (1) अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, (2) न वह जनिता है और न जन्य, (3) और न कोई उसका समकक्ष है।" (4) कहो, "मैं शरण लेता हूँ, प्रकट करनेवाले रब की, (1) जो कुछ भी उसने पैदा किया उसकी बुराई से, (2) और अँधेरे की बुराई से जबकि वह घुस आए, (3) और गाँठो में फूँक मारने-वालों की बुराई से, (4) और ईर्ष्यालु की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।" (5) कहो, "मैं शरण लेता हूँ मनुष्यों के रब की (1) मनुष्यों के सम्राट की (2) मनुष्यों के उपास्य की (3) वसवसा डालनेवाले, खिसक जानेवाले की बुराई से (4) जो मनुष्यों के सीनों में वसवसा डालता हैं (5) जो जिन्नों में से भी होता हैं और मनुष्यों में से भी (6)