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Monday 24th of July 2017
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इमाम तकी अलैहिस्सलाम के मोजेज़ात



(1) इमाम अली रज़ा (अ.स) की शहादत के बाद मुखतलिफ शहरो से 80 ओलामा और दानिशमंद हज करने के लिये मक्का रवाना हुए। वो सफर के दौरान मदीना भी गए , ताकि इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की ज़ियारत भी करलें। उन लोगो ने इमाम सादिक़ (अ.स) के एक खाली घर में क़याम किया।


इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) जो उस वक्त कमसिन थे। उन की बज़्म में तशरीफ लाए ,मौफिक़ ,नामी शख्स नें लोगों से आप का तारुफ कराया। सब ही ऐहतेराम में खड़े हो गए ,और सब ने आपको सलाम किया। उसके बाद उन लोगोनें सवालात करना शुरु किये। हज़रत ने हर एक का जवाब दिया (उस वाक़ए से हर एक को आपकी इमामत का मज़ीद यक़ीन हो गया) हर एक खुशहाल था। सब ने आपकी ताज़ीम की और आपके लिये दुआऐं कीं।


उनमें से एक शख्स इस्हाक़ भी थे जिस का बयान है कि मैंने एक ख़त में दस सवाल लिख लिये थे कि मौक़ा मिलने पर हज़रत से इस का जवाब चाहुंगा। अगर उन्होंने तमाम सवालों का जवाब दे दिया तो उस वक्त हज़रत से उस बात का तक़ाज़ा करुंगा कि वो मेरे हक़ में ये दुआ फरमाऐं कि मेरी ज़ौजा के हमल को खुदा फरज़ंद करार दे। नशिस्त काफी तूलानी हो गयी। लोग मुसलसल आपसे सवाल कर रहे थे और आप हर एक का जवाब दे रहे थे। ये सोच कर मैं उठा कि खत कल हज़रत की खिदमत में पेश करुंगा। इमाम की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी इरशाद फरमायाः


इस्हाक़। खुदा ने मेरी दुआ क़ुबूल कर ली है। अपने फरज़ंद का नाम अहमद रखना।


मैंने कहाः खुदाया तेरा शुक्र , यक़ीनन यही हुज्जते खुदा हैं।


जब इस्हाक़ वतन वापस आया खुदा ने उसे एक फरज़ंद अता किया जिसका नाम उसने ,अहमद ,रखा।

(ऐवानुल मौजेज़ात , पेज न.109)


शियो के हालात का इल्म

(2) इमरान बिन मौहम्मद अशअरी का बयान है कि मैं हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की खिदमत में शरफयाब हुआ तमाम बातों के बाद इमाम से अर्ज़ किया कि।


उम्मुलहसन ने आपकी खिदमत में सलाम अर्ज़ किया है और ये दरख्वास्त की है कि आप अपना एक लिबास इनायत फरमाऐं जिसे वो अपना कफन बना सके।


इमाम ने फरमायाः वो इन चीज़ों से बेनियाज़ हो चुकी है।


मैं इमाम के इस जुम्ले का मतलब नहीं समझ सका। यहा तक की मुझ तक ये खबर पहुची कि जिस वक्त मैं इमाम की खिदमत में हाज़िर था उस से 13,14 रोज़ पहले ही उम्मुल हसन का इन्तेक़ाल हो चुका था।

(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 43 , खराइज रावंदी पेज न. 237)


लूट के माल की खबर होना

(3) अहमद बिन हदीद का बयान है कि एक काफिला के हमराह जा रहा था रास्ते में डाकूओं नें हमें घेर लिया (और हमारा सारा माल लूट लिया) जब हम लोग मदीना पहुचे एक गली में इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) से मुलाक़ात हुई। हम लोग उनके घर पहुचे और सारा वाक़ेआ बयान किया। इमाम (अ.स) ने हुक्म दिया और कपड़ा , पैसा हम को लाकर दिया गया। इमाम ने फरमायाः जितने पैसे ड़ाकू ले गए हैं उसी हिसाब से आपस में तक़सीम कर लो। हमने पैसा आपस में तक़सीम किया। मालूम ये हुआ कि जितना ड़ाकू ले गए थे उसी कद्र इमाम (अ.स) ने हमें दिया है। उस मिक़्दार से न कम था न ज़्यादा।

(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 44 , मुताबिक रिवायत खराइज रावंदी।)


इमाम का लिबास

(4) मौहम्मद बिन सहल क़ुम्मी का बयान है कि मै मक्के में मुजाविर हो गया था। वहा से मदीना गया और इमाम का मेहमान हुआ। मैं इमाम से उनका एक लिबास चाहता था मगर आखिर वक्त तक अपना मतलब बयान ना कर सका। मैंने अपने आप से कहाः अपनी इस ख्वाहिश को एक खत के ज़रिये इमाम की खिदमत में पेश करुं और मैने यही किया। उसके बाद मैं मस्जिदे नबवी चला गया और वहा ये तय किया की दो रकत नमाज़ बजा लाऊं और खुदा वंदे आलम से 100 मर्तबा तलब खैर करुं। उस वक्त अगर दिल ने गवाही दी तो खत इमाम की खिदमत में पेश करुंगा। वरना इस को फाड़ कर फेंक दूंगा।।।मेरे दिल ने गवाही नहीं दी ,मैंने खत फाड़ कर फेंक दिया और मक्का की तरफ रवाना हो गया।।।।रास्ते मे मैंने एक शख्स को देखा जिसके हाथ मे रुमाल है जिस्में एक लिबास है और वो शख्स काफिला में मुझे तलाश कर रहा है।जब वो मुझ तक पौंहचा तो कहने लगाः तुम्हारे मौला ने ये लिबास तुम्हारे लिये भेजा है।

(खराइज रावंदी , पेज न. 237 , बिहारुल अनवार जिल्द 50 , पेज न. 44।)


(5) दरख्त पर फलो का आ जाना

मामून ने इमाम (अ.स) को बग़दाद बुलाया और अपनी बेटी से आपकी शादी की। लेकिन आप बग़दाद में ठहरे नहीं और अपनी बीवी के साथ मदीना वापस आ गये।


जिस वक्त इमाम मदीना वापस हो रहे थे। उस वक्त काफी लोग आप को विदा करने के लिये शहर के दरवाज़े तक आपके साथ आए और खुदा हाफिज़ कहा।


मग़रिब के वक्त आप ऐसी जगह पहुचे जहा एक पुरानी मस्जिद थी। नमाज़े मग़रिब के लिये इमाम (अ.स) उस मस्जिद में तशरीफ ले गए। मस्जिद के सहन में एक बेर का दरख्त था जिस पर आज तक फल नहीं आए थे। इमाम (अ.स) ने पानी तलब किया और उस दरख्त के नीचे वुज़ु फरमाया और जमाअत के साथ मगरिब की नमाज़ अदा फरमाई। उसके बाद आपने चार रकत नमाज़े नाफेला पढ़ी। उसके बाद आप सज्दए शुक्र बजा लाए और आपने तमाम लोगों को रुख्सत कर दिया।


दूसरे ही दिन उस दरख्त में फल आ गए और बेहतरीन फल ये देख कर लोगों को बहुत तआज्जुब हुआ।

(नूरुल अबसार शबलनजी , पेज न. 179 , ऐहक़ाक़ुल हक , जिल्द 12 पेज न. 424 , काफी , जिल्द न. 1 , पेज न. 497 , इर्शाद मुफीद , पेज न. 304 ,मुनाक़िब ,जिल्द न. 4 , पेज न. 390)


जनाब शैख मुफीद अलैहिर्रहमा का बयान है कि इस वाकए के बरसों बाद मैनें खुद उस दरख्त को देखा और उस का फल खाया।


(6) इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत का ऐलान

उमय्या बिन अली का बयान है कि जिस वक्त इमाम रज़ा (अ.स) खुरासान में तशरीफ फरमा थे उस वक्त मैं मदीने में ज़िन्दगी बसर कर रहा था और इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) के घर मेरा आना जाना था। इमाम के रिशतेदार आम-तौर से सलाम करने इमाम (अ.स) की खिदमत में हाज़िर होते थे। एक दिन इमाम (अ.स) ने कनीज़ से कहाः उन (औरतों) से कह दो अज़ादारी के लिये तैय्यार हो जाऐ। इमाम (अ.स) ने एक बार फिर इस बात की ताकीद फरमाई कि वो लोग अज़ादारी के लिये आमादा हो जाऐं।


लोगों ने दरयाफ्त कियाः किस की अज़ादारी के लिये।


फरमायाः रुए ज़मीन के सबसे बेहतरीन इन्सान के लिये।


कुछ अर्से के बाद इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत की खबर मदीना आई। मालूम हुआ कि उसी दिन इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत वाके हुई है जिस दिन इमाम (अ.स) ने फरमाया था कि अज़ादारी के लिये तैय्यार हो जाओ।

(आलामुलवरा , पेज न. 334)


(7) ऐतराफे क़ाज़ी


क़ज़ी याहिया बिन अक्सम , जो खान्दाने रिसालत व इमामत के सख्त दुशमनों में था। उस ने खुद इस बात का ऐतराफ किया है कि एक दिन रसूले खुदा (स.अ.वा.व) की क़ब्रे मुताहर के नज़दीक इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) को देखा उनसे कहा खुदा की क़सम। मैं कुछ बातें आप से दरयाफ्त करना चाहता हुं लेकिन मुझे शर्म महसूस हो रही है।


इमाम (अ.स) ने फरमायाः सवाल के बगैंर तुम्हारी बातों के जवाब दे दूंगा। तुम ये दरयाफ्त करना चाहते हो कि इमाम कौन है।


मैने कहाः खुदा की क़सम यही दरयाफ्त करना चाहता था।


फरमायाः मैं इमाम हुं ,


मैने कहाः इस बात पर कोई दलील है।


उस वक्त वो असा जो इमाम के हाथों मे था। वो गोया हुआ और उसने कहाः ये मेरे मौला हैं इस ज़माने के इमाम हैं और खुदा की हुज्जत है।

(क़ाफी , जिल्द 1 , पेज न. 353 , बिहारुल अनवार , जिल्द 50 , पेज न. 68)


(8) पड़ौसी की नजात

अली बिन जरीर का बयान है कि मैं इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की खिदमते अक़दस में हाज़िर था। इमाम के घर की एक बकरी ग़ायब हो गई थी। एक पडौसी को चोरी के इल्ज़ाम में खेंचते हुऐ इमाम (अ.स) की खिदमत में लाए।


इमाम ने फरमायाः


अफसोस हो तुम पर इसको आज़ाद करो इसने बकरी नहीं चुराई है। बकरी इस वक्त फलॉ घर में है जाओ वहा से ले आओ।


इमाम (अ.स) ने जहा बताया था वहा गए और बकरी को ले आए और घर वाले को चोरी के इल्ज़ाम मे गिरफ्तार किया। उस की पिटाई की उसका लिबास फाड़ ङाला और वो क़सम खा रहा था कि उसने बकरी नहीं चुराई है। उस शख्स को इमाम की खिदमत मे लाए।


इमाम ने फरमायाः वाए हो तुम पर। तुम ने इस शख्स पर ज़ुल्म किया। बकरी खुद इसके घर मे चली गयी थी। उसको खबर भी न थी।


उस वक्त इमाम ने उसकी दिलजोई के लिये और उसके नुक़सान को पूरा करने के लिये एक रक़म उसको अता फरमाई।

(बिहारुल अनवार , जिल्द 50 ,पेज न. 47 , खराइज रावंदी की रिवायत के मुताबिक)


(9) क़ैद की रेहाई

अली बिन खालिद , का बयान है कि सामर्रा मे मुझे ये ऐत्तेला मिली कि एक शख्स को शाम से गिरफतार करके यहा लाए हैं और क़ैद खाना में उसको क़ैद कर रखा है। मशहूर है कि ये शख्स नबुवत का मुददई है।


मैं क़ैदखाना गया। दरबान से नेहायत नर्मी और ऐहतराम से पेश आया। यहा तक की मैं उस क़ैदी तक पहुंच गया। वो शख्स मुझे बाहम और अक़्लमंद नज़र आया। मैने उससे दरयाफ्त किया कि तुम्हारा क्या किस्सा है।


कहने लगाः शाम मे एक जगह है जिसको रासुल हुसैन कहते हैं (जहा इमाम हुसैन (अ.स) का सरे मुक़द्दस रखा गया था) मैं वहा इबादत किया करता था। एक रात जब मैं ज़िक्रे इलाही मे मसरूफ था। एक-दम एक शख्स को अपने सामने पाया। उसने मुझ से कहा खड़े हो जाओ।


मै खड़ा हो गया। उसके साथ चन्द कदम चला। देखता क्या हुं कि मसिज्दे कूफा में हुं। उसने मुझ से पूछाः इस मस्जिद को पहचानते हो।


मैने कहाः हाँ ये मस्जिदे कूफा है।


वहा हमने नमाज़ पढ़ी फिर हम वहा से बाहर चले आए। फिर थोड़ी दूर चले थे कि देखा मदीना मे मसिज्दे नबवी मे हुं। रसूले अकरम की क़ब्रे अतहर की ज़ियारत की मसिज्द मे नमाज़ पढ़ी। फिर वहा से चले आए फिर चन्द कदम चले देखा कि मक्का मे मौजूद हुं। खानए क़ाबा का तवाफ किया और बाहर चले आए फिर चन्द कदम चले तो अपने को शाम मे उसी जगह पाया जहा। मैं इबादत कर रहा था और वो शख्स मेरी नज़रों से पोशीदा हो गया।


जो कुछ देखा था। वो मेरे लिये काफी ताअज्जुब खैज़ था। यहा तक की इस वाकऐ को कई साल गुज़र गया। एक साल बाद वो शख्स फिर आया। गुज़िशता साल की तरह इस मर्तबा भी वही सब वाकेआत पेश आए। लेकिन इस मर्तबा जब वो जाने लगा तो मैने उस को क़सम देकर पूछाः आप कौन हैं।


फरमायाः मौहम्मद बिन अली बिन मूसा बिन जाफर बिन मौहम्मद बिन अली इब्नुल हुसैन बिन अली इब्ने अबितालिब हुं।


ये वाकेआ मैने बाज़ लोगों से बयान किया उसकी खबर मोतसिम अब्बासी के वज़ीर मौहम्मद बिन अब्दुल मलिक ज़यात तक पहुची। उसने मेरी गिरफ्तारी का हुक्म दिया जिस की बना पर मुझे क़ैद करके यहा लाया गया है। झूठों ने ये खबर फैला दी कि मैं नबूवत का दावेदार हुं।


अली बिन खालिद का बयान है कि मैने उससे कहा कि अगर तुम इजाज़त दो तो सही हालात ज़यात को लिख कर भेजु ताकि वो सही हालात से बा खबर हो जाए।


वो कहने लगाः लिखो।


मैने सारा वाकेआ ज़यात को लिखा। उसने इसी खत की पुश्त पर जवाब लिखा कि उससे कहो कि जो शख्स एक शब मे उसे शाम से कूफा , मदीना और मक्का ले गया और वापस ले आया , उसी से रेहाई तलब करे।


ये जवाब सुन कर मै बहुत रन्जीदा हुआ। दूसरे दिन मै क़ैदखाना गया ताकि उसे सब्रो शुक्र की तल्कीन करुं और उसका हौसला बढ़ाऊं।


जब वहा पहुचा तो देखा दरबान और दूसरे अफराद परेशान हाल नज़र आ रहे हैं। दरयाफ्त किया कि वजह किया है।


कहने लगे जो शख्स पैग़म्बरी का दावेदार था वो कल रात क़ैद खाना से नहीं मालूम किस तरह बाहर चला गया। ज़मीन मे धंस गया या आसमान मे उड़ गया। मुसलसल तलाश के बाद भी उसका कोई पता ना चला।

(इर्शाद मुफीद ,पेज न. 304 , आलामुल वुरा , पेज न. 332 , ऐहक़ाक़ुल हक़ , जिल्द 12 , पेज न. 427 , अलफसूलुल मुहिम्मा , पेज न. 289)


अबासलत की रिहाई

(10) अबासलत हरवी इमाम रज़ा (अ.स) के मुकर्रब तरीन असहाब मे से थे इमाम रज़ा (अ.स) की शहादत के बाद मामून के हुक्म से आप को कैद कर दिया गया।


आप का बयान है कि एक साल तक कैदखाना मे रहा। आजिज़ आ गया एक रात सारी रात दुआ इबादत मे मशग़ूल रहा। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) और अहलेबैत (अ.स) को अपने मसाएल के सिलसिले मे वास्ता क़रार देकर खुदा से दुआ मॉगी कि मुझे रेहाई अता फरमाऐ। अभी मेरी दुआ तमात भी न होने पाई थी कि देखा इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) मेरे पास मौजूद हैं। मुझ से फरमायाः ऐ अबासलत क्या क़ैद आजिज़ आ गये।


अर्ज़ कियाः ऐ मौला हा आजिज़ आ गया हु।


फरमायाः उठो आपने ज़न्जीरों पर हाथ फेरा। उसके सारे हल्के खुल गए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और क़ैद खाना से बाहर ले आए। दरबानो ने मुझे देखा मगर हज़रत के रोअबो जलाल से किसी मे ज़बान खोलने की सकत नहीं थी। जब इमाम मुझे बाहर ले आए तो मुझ से फरमायाः जाओ खुदा हाफिज़ अब न मामून तुम्हे देखेगा और ना तुम ही उसको देखोगे। जैसा इमाम (अ.स) ने फरमाया था वैसा ही हुआ।

(मुन्तहल आमाल सवानेह उम्री हज़रत इमाम रज़ा (अ.स) , पेज न. 67 , उयूने अखबार , जिल्द 2 , पेज न. 247 , बिहारुल अनवार , जिल्द 49 , पेज न. 303)


(11) मोतसिम अब्बासी की नशिस्त

ज़रक़ान , जो इब्ने अबी दाऊद (इब्ने अबी दाऊद ,मामून ,मोतसिम ,वातिक़ और मुतावक्किल के ज़माने मे बग़दाद के क़ाज़ीयों मे था।) का गहरा दोस्त था। उसका बयान है कि एक दिन इब्ने अबी दाऊद , मोतसिम की बज़्म से रन्जीदा वापस आ रहा था। मैने रन्जीदगी का सबब दरयाफ्त किया कहने लगाः ऐ काश मै बीस साल पहले मर गया होता।


पूछाः आखिर क्युं।


कहा आज मोतसिम की बज़्म मे अबु जाफर इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) से जो सदमा मुझे पहुचा है।


पूछाः माजरा क्या है।


कहाः एक शख्स ने चोरी का एतराफ किया और मोतसिम से ये तकाज़ा किया कि वो हद जारी करके उसे पाक करदे मोतसिम ने तमाम फोक़हा को जमा किया उनमें मौहम्मद बिन अली इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) भी थे मोतसिम ने हमसे पूछा चोर का हाथ कहा से काटा जाए।


मैने कहाः कलाई से।


पूछा उसकी दलील क्या है।


मैने कहाः आयते तमय्युम मे हाथ का इत्लाक़ कलाई तक हुआ है।


अपने चेहरे और हाथों का मसह करो। कलाई तक हाथ का इत्लाक़ हुआ है। इस मसअले मे फोक़हा की एक जमाअत मेरे मवाफिक़ थी। सब का कौल यही था कि चोर का हाथ कलाई से काटा जाए। लेकिन दूसरे फोक़हा का नज़रिया ये था कि चोर का हाथ कोहनी से काटा जाए। मोतसिम ने उनसे दलील तलब की उन्होंने कहा आयये वुज़ु में हाथ का इत्लाक़ कोहनी तक हुआ है।


अपने चेहरों को धोओ और हाथों को कोहनियों तक यहा कोहनी तक हाथ का इत्लाक़ हुआ है।


उस वक्त मोतसिम ने मौहम्मद बिन अली (इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स) की तरफ रुख किया और पूछा कि इस मसअले मे आपकी क्या राए है।


फरमायाः इन लोगों ने अपने नज़रयात बयान कर दिये हैं। मुझे माफ रखो।


मोतसिम ने बहुत इसरार किया और कसम दे कर कहा कि आप अपना नज़रिया ज़रूर बयान फरमाइये।


फरमायाः चूंकि तुमने कसम दी है लेहाज़ा सुनो ये सब लोग गलती पर हैं। चोर की सिर्फ चार ऊगलिया काटी जाऐगी।


मोतसिम ने दरयाफ्त किया कि इस की दलील किया है।


फरमायाः रसूले खुदा (स.अ.व.व) का इर्शाद है कि सजदा सात आज़ा पर वाजिब हैः पेशानी , हाथ की हथेलिया , दोनो घुटने और पाँव के दोनो अंगूठे।


लेहाज़ा अगर कलाई या कोहनी से चोर का हाथ काटा जाए तो वो सज्दा किस तरह करेगा और खुदा वंदे आलम का इर्शाद है।


जिन सात आज़ा पर सज्दा वाजिब है। वो सब खुदा के लिये हैं। खुदा के साथ किसी और की इबादत ना करो और जो चीज़ खुदा के लिये हो वो काटी नहीं जा सकती है।


इब्ने अबी दाऊद का कहना है कि मोतसिम ने आप का जवाब पसंद किया और हुक्म दिया कि चोर की सिर्फ चार ऊगलिया ही काटी जाएं और सब के सामने हम सब की आबरु चली गयी। उस वक्त मैने (शर्म के मारे) मौत की तमन्ना की।


(तफसीर अय्याशी , जिल्द 1 , पेज न. 319 , बिहारुल अनवार , जिल्द 50 ,पेज न. 5)

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