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استاد حسین انصاریان

फ़रिशतगाने ख़ुदा

फ़रिशतगाने ख़ुदा

फ़रिश्तों के वुजूद पर हमारा अक़ीदह है कि और हम मानते हैं कि उन में से हर एक की एक ख़ास ज़िम्मेदारी है-

एक गिरोह पैगम्बरों पर वही ले जाने पर मामूर हैं[1]।

एक गिरोह इँसानों के आमाल को हिफ़्ज़ करने पर[2]

एक गिरोह रूहों को क़ब्ज़ करने पर[3]

एक गिरोह इस्तेक़ामत के लिए मोमिनो की मदद करने पर[4]

एक गिरोह जँग मे मोमिनों की मदद करने पर[5]

एक गिरोह बाग़ी कौमों को सज़ा देने पर[6]

और उनकी एक सबसे अहम ज़िम्मेदारी इस जहान के निज़ाम में है।

क्योँ कि यह सब ज़िम्मेदारियाँ अल्लाह के हुक्म और उसकी ताक़त से है लिहाज़ अस्ले तौहीदे अफ़आली व तौहीदे रबूबियत की मुतनाफ़ी नही हैं बल्कि उस पर ताकीद है।

ज़िमनन यहाँ से मस्ला-ए-शफ़ाअते पैग़म्बरान, मासूमीन व फ़रिश्तेगान भी रौशन हो जाता है क्योँ कि यह अल्लाह के हुक्म से है लिहाज़ा ऐने तौहीद है। “मा मिन शफ़ीइन इल्ला मिन बअदि इज़निहि[7] ” यानी कोई शफ़ाअत करने वाला नही है मगर अल्लाह के हुक्म से।

मस्ला ए शफ़ाअत और तवस्सुल के बारे में और ज़्यादा शरह (व्याख्या) नबूवते अंबिया की बहस में देँ गे।



[1] सूरए बक़रह आयत न. 97

[2] सूरए इँफ़ितार आयत न.

[3] सूरए आराफ़ आयत न. 37

[4] सूरए फ़ुस्सिलत आयत न. 30

[5] सूरए अहज़ाब आयत न. 9

[6] सूरए हूद आयत न. 77

[7] सूरए यूनुस आयत न. 3

स्रोत
  • http://al-shia.org