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Saturday 18th of November 2017
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आयतुल कुर्सी

अहमद बड़ी ग़मगीन हालत में अपनी दादी के बारे में सोच रहा था। पुरानी यादों के साथ-साथ आँसुओं का एक सैलाब उसकी आँखों से जारी था। परदेस में दादी की मौत की ख़बर ने उसे हिला कर रख दिया था।
काग़ज़ों और फ़ाइलों से भरी हुई डेस्क पर सर रखे हुए वह अपनी दादी को याद कर रहा था। दादी माँ के साथ गुज़ारा हुआ हर पल उन के मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ उसकी आँखों के सामने मौजूद था। न तो यादें धुंधली हुई थीं और न ही उनका चेहरा।
दादी माँ उसे बहुत चाहती थीं। वैसे सब की दादी मुहब्बत करने वाली होती हैं लेकिन अहमद को अपनी दादी की चाहत बहुत ख़ास और अलग दिखाई देती थी। शायद इसकी वजह यह थी कि उसके पापा और अम्मी दोनों सर्विस करते थे और वह घर का इकलौता बेटा था। पापा और अम्मी दोनों सुब्ह ऑफ़िस के लिए निकल जाते थे और शाम में लौट कर आते थे। उसे स्कूल के लिए तैयार करना, टिफ़िन देना और स्कूल बस में बैठाना दादी का ही काम था। स्कूल से लौटने के बाद भी दोपहर का खाना और फिर टूयुशन-टीचर को नाश्ता देना भी उन्हीं की ज़िम्मेदारी थी। इस वजह से वह दादी माँ से बहुत क़रीब हो गया था।
वह उन्हें परेशान भी बहुत करता था। कुछ शरारतें सोच कर अहमद बहते हुए आँसुओं के बीच मुस्कुराने लगा।
उसे दादी माँ की झुर्रियों पर हाथ फेरना बहुत अच्छा लगता था। वह जब भी दादी माँ को सोते हुए या कोई काम करते हुए देखता था तो उनके चेहरे और हाथ की झुर्रियों को छूता और उन पर हाथ फैरता था। दादी ग़ुस्से से चिल्लातीं "अभी तुझे बताती हूँ" और जैसे ही वह यह कहने के लिए अपना मुँह खोलतीं तो वह बहुत संजीदा होकर कहता, "अरे यह क्या! आप के मुँह में तो दाँत भी नहीं हैं। आप ज़रूर रात में मिठाई खाती होंगी और ब्रश किये बिना ही सो जाती होंगी और इस लिए चूहे रात में आकर आप के सारे दाँत ले गऐ हैं।" यह सुन तो दादी अपनी लाठी उठा लेती थीं। तब वह उन से कहता था कि आप मुझे बता दीजिए कि आप ने किस तरह अपनी खाल इस तरह बना ली है ताकि मैं भी अपनी खाल इसी तरह कर लूँ। फिर आप को परेशान नहीं करूंगा। यह कहते-कहते वह भाग कर दूर निकल जाता और दादी थोड़ी दूर लाठी उठा कर चलने के बाद खड़ी हो जाती थीं और कहती थीं, अब जब मेरे पास आओगे तो बताऊंगी।
लेकिन वह जानता था कि दादी माँ सच में ग़ुस्सा नहीं करती हैं बल्कि शायद उन्हें यह अच्छा भी लगता है। इस लिए तो बात में कुछ भी नहीं कहती थीं।
दादी माँ की सब से ख़ास बात यह थी कि वह सब को बीमारी में क़ुरआन की आयतें लिख कर देती थीं। वह किसी भी बीमार को ख़ाली हाथ नहीं जाने देती थीं। लेकिन इस से भी ज़्यादा ख़ास बात यह थी कि उन्हें जिन बीमारियों का नाम भी नहीं मालूम था बल्कि वह नई-नई बीमारियाँ जिन का नाम सुनने के बाद भी उसे दोहरा नहीं पाती थीं वह उन बीमारियों के लिए भी कोई न कोई आयत ढ़ूँढकर  दे ही देती थीं।
इस के साथ उसे अपनी एक शरारत भी याद आ गई। उसे खेल में चोट लग गई थी और वह दवा लेने के लिए बाहर जा रहा था। तभी दरवाज़े पर रुक कर उसने कहा, "दादी आप अपने मेडिकल स्टोर से कोई दवा दे दीजिए ना।"
"मेरा कौन सा मेडिकल स्टोर है" दादी माँ ने अपना चश्मा सही करते हुए कहा।
"अरे वही जिस से आप सब को दवाएं देती हैं।" दादी माँ समझ गई थीं और फिर तो देखने वाला मंज़र था कि उन्हों ने किस तेज़ी से उठ कर अपनी लाठी उठाई थी। आज बताती हूँ तूझे, और कुछ देर के बाद वह उसके सर पर लाठी उठाए हुए थीं और वह आगे-आगे कान पकड़े हुए चल रहा था। क़ुरआन के पास पहुंचने के बाद उन्हों ने कहा, "चलो इसे चूमो" और उसने चूमने से पहले कनखियों से दादी माँ को देखा और जल्दी से डर कर क़ुरआन को चूम लिया। "अब कभी ऐसी बात न सुनूँ" जी दादी माँ कह कर वह बाहर निकल गया। शायद ज़िन्दगी में पहली और आख़िरी बार दादी में सच में ग़ुस्सा हुई थीं और उसे भी पहली बार उन से डर लगा था।
दवा लाने के बाद फिर वही अहमद था और उसकी वही चाहने वाली दादी।
दादी माँ ने ही उसे क़ुरआन पढ़ना सिखाया था और सूर-ए-हम्द, इन्ना आतैना और क़ुल हुवल्लाह याद कराने के बाद आयतलकुर्सी भी याद कराई थी। यह सोच कर उसने डेक्स पर रखा हुआ क़ुरआन खोल लिया और आयतलकुर्सी निकाल कर पढ़ने लगा।
"अल्लाहू ला-इला-ह इल्ला हु-व"
अल्लाह के अलावा कोई ऐसा नहीं है कि जिसकी इबादत की जाए और जिसे ख़ुदा माना जाए। इसका तो पहला ही जुमला बहुत ख़ास है। अगर इस जुमले को फैला दिया जाए तो पूरा इस्लाम बन जाए और अगर पूरे इस्लाम को समेट कर एक जुमले में बयान करना चाहें तो यही जुमला पेश किया जा सकता है क्यों कि इस्लाम के हर अक़ीदे और अमल की बुनियाद यही तौहीद यानी एक ख़ुदा को मानना और उस पर ईमान लाना है।
तौहीद का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि ख़ुदा दो नहीं है, एक है बल्कि इसका मतलब यह है कि हमारा ख़ालिक़ और मालिक और इस दुनिया को चलाने वाला जिस के हाथ में सब कुछ है वह सिर्फ़ ख़ुदा है। ख़ुदा की तरफ़ से हर आने वाले नबी और मासूम इमामों ने यही पैग़ाम पहुंचाया है।
"अल-हय-युल क़ैय-यूम"
वह ज़िन्दा है लेकिन दूसरों की तरह से नहीं यानी दूसरी ज़िन्दा मख़लूक़ की ज़िन्दगी अपनी नहीं है बल्कि उन को यह ज़िन्दगी ख़ुदा ने दी है और वह अपनी ज़िन्दगी बाक़ी रखने के लिए भी ख़ुदा की मोहताज हैं। लेकिन ख़ुदा ऐसा नहीं है क्यों कि वह किसी का मोहताज नहीं है और सब को उसकी ज़रूरत है और वही सब को बाक़ी रखे हुए है।
"ला ताख़ुज़ु-हू सि-न-तुँ वला नौम"
न तो उसे ऊँघ आती है और न ही नींद। हर ज़िन्दा मख़लूक़ को ऊँघ और नींद आती है जिसकी वजह से वह हर वक़्त काम नहीं कर सकते हैं लेकिन जो पूरी दुनिया का चलाने वाला हो उसे तो ऐसा ही होना चाहिए कि उसे ऊँघ और नींद न आए वरना यह दुनिया ख़त्म हो जाएगी।
और इसका मतलब यह है कि वह दोपहर का शोर-शराबा हो या रात का सन्नाटा, ख़ुदा को किसी भी वक़्त पुकारा जा सकता है और उस से हर वक़्त बात की जा सकती है।
"लहू मा फिस्समा-वाति वमा फ़िल अर्ज़"
ज़मीन और आसमान में जो कुछ है वह ख़ुदा का है। यह भी बहुत अहम वाक्य है क्यों कि अगर हम दिल से मान लें कि ज़मीन व आसमान में जो कुछ है वह ख़ुदा का ही है तो, हम ने दुनिया की हर चीज़ के बारे में अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हो जाएगा क्यों कि यह चीज़ें हमारी या हमारे जैसे दूसरों की नहीं बल्कि अस्ल में ख़ुदा की हैं। हम हर काम और हर चीज़ के बारे में ख़ुदा पर भरोसा करना सीख जाएंगे। हमें इस बात का भी एहसास हो जाएगा कि हम भी ख़ुदा के लिए ही हैं और उसी के बन्दे हैं।
"मन ज़ल-लज़ी यश-फ़उ इन्दहू इल्ला बि-इज़-निही"
उसकी इजाज़त के बिना कोई शिफ़ाअत नहीं कर सकता। इसका मतलब यह है कि शिफ़ाअत पार्टी बाज़ी नहीं है। शिफ़ाअत का मतलब है मीडियम बनना। अम्बिया और इमाम इंसानों तक ख़ुदा का पैग़ाम पहुंचाने का ज़रिया हैं और इस तरह वह इस दुनिया में इंसानों की शिफ़ाअत करते हैं। इस पैग़ाम पर अमल करने में जो लोग ग़लतियां कर देते हैं अम्बिया और इमाम ख़ुदा के सामने उनकी शिफ़ाअत करेंगे।
शिफ़ाअत, शिफ़ाअत करने वाले और शिफ़ाअत होने वाले को एक दूसरे से नज़दीक करती है और इस तरह यह शिफ़ाअत होने वाले की तरबियत का एक ज़रिया है।
"यअ-लमु मा बैना ऐ-दी-हिम वमा ख़ल-फ-हुम"
आम तौर पर शिफ़ाअत करने वाले जिसकी शिफ़ाअत करते हैं उसके बारे में कोई नई बात पेश कर देते हैं लेकिन ख़ुदा के सामने ऐसा कुछ नहीं हो सकता क्यों कि वह शिफ़ाअत करने वालों के बारे में भी जानता है और जिन की शिफ़ाअत की जा रही है उन को भी अच्छी तरह जानता है।
"वला युहीतू-न बि-शै-इम मिन इल्मिहि इल्ला बिमा शा-अ"
ख़ुदा जिन बातों को जानता है वह उन बातों को नहीं जानते हैं मगर कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो ख़ुदा उन्हें बता देता है। शिफ़ाअत करने वालों का इल्म भी लिमिटेड है और उन के पास जो कुछ भी इल्म है वह ख़ुदा का ही दिया हुआ है।
"वसि-अ कुर-सि-य्यु हुस-समा-वाति वल अर्ज़"
ज़मीन व आसमान पर ख़ुदा का कंट्रोल है। इस दुनिया की कोई भी चीज़ उसके इल्म, उसकी ताक़त और कंट्रोल से बाहर नहीं है।
"वला यऊ-दुहु हिफ़्ज़ु-हुमा"
वह इस ज़मीन और आसमान की हिफ़ाज़त करने से थकता भी नहीं है। बहुत से बड़े-बड़े काम करने वाले थक जाते हैं लेकिन ज़मीन व आसमान को बनाने और उन्हें बाक़ी रखने वाला ख़ुदा कभी नहीं थकता।
"व-हुवल अलिय्युल अज़ीम"
हाँ! ऐसा ख़ुदा बहुत बुलंद और अज़ीम है।
अब अहमद सोच रहा था कि आयतल कुर्सी तो बहुत अहम आयत है जिस में बहुत कुछ बयान किया गया है। इसी वजह से रिवायतों में इस की इतनी फ़ज़ीलत और अहमियत बयान की गई है और इसे हर रोज़ पढ़ने के लिए कहा गया है।
यह सोचते हुए फिर अहमद को अपनी दादी माँ की याद आ गई जिन्हों ने उसे आयतल कुर्सी याद कराई थी और उस ने दिल ही दिल में उन का शुक्रिया अदा किया। फिर नम आँखों के साथ इसका सवाब उन्हें बख़्श दिया कि शायद इस तरह उनकी मुहब्बतों और मेहनतों का कुछ हक़ अदा हो सके।

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