निस्संदेह तुम्हारा रब जानता है कि तुम लगभग दो तिहाई रात, आधी रात और एक तिहाई रात तक (नमाज़ में) खड़े रहते हो, और एक गिरोंह उन लोगों में से भी जो तुम्हारे साथ है, खड़ा होता है। और अल्लाह रात और दिन की घट-बढ़ नियत करता है। उसे मालूम है कि तुम सब उसका निर्वाह न कर सकोगे, अतः उसने तुमपर दया-दृष्टि की। अब जितना क़ुरआन आसानी से हो सके पढ़ लिया करो। उसे मालूम है कि तुममे से कुछ बीमार भी होंगे, और कुछ दूसरे लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह (रोज़ी) को ढूँढ़ते हुए धरती में यात्रा करेंगे, कुछ दूसरे लोग अल्लाह के मार्ग में युद्ध करेंगे। अतः उसमें से जितना आसानी से हो सके पढ़ लिया करो, और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात देते रहो, और अल्लाह को ऋण दो, अच्छा ऋण। तुम जो भलाई भी अपने लिए (आगे) भेजोगे उसे अल्लाह के यहाँ अत्युत्तम और प्रतिदान की दृष्टि से बहुत बढ़कर पाओगे। और अल्लाह से माफ़ी माँगते रहो। बेशक अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
(20)
ऐ ओढ़ने लपेटनेवाले!
(1)
उठो, और सावधान करने में लग जाओ
(2)
और अपने रब की बड़ाई ही करो
(3)
अपने दामन को पाक रखो
(4)
और गन्दगी से दूर ही रहो
(5)
अपनी कोशिशों को अधिक समझकर उसके क्रम को भंग न करो
(6)
और अपने रब के लिए धैर्य ही से काम लो
(7)
जब सूर में फूँक मारी जाएगी
(8)
तो जिस दिन ऐसा होगा, वह दिन बड़ा ही कठोर होगा,
(9)
इनकार करनेवालो पर आसान न होगा
(10)
छोड़ दो मुझे और उसको जिसे मैंने अकेला पैदा किया,
(11)
और उसे माल दिया दूर तक फैला हुआ,
(12)
और उसके पास उपस्थित रहनेवाले बेटे दिए,
(13)
और मैंने उसके लिए अच्छी तरह जीवन-मार्ग समतल किया
(14)
फिर वह लोभ रखता है कि मैं उसके लिए और अधिक दूँगा
(15)
कदापि नहीं, वह हमारी आयतों का दुश्मन है,
(16)
शीघ्र ही मैं उसे घेरकर कठिन चढ़ाई चढ़वाऊँगा
(17)