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ईदे ज़हरा ???
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हमारे समाज में बहुत सी ईदें आती हैं जैसे ईद उल फि़त्र, ईदे क़ुरबान, ईदे मुबाहिला और ईदे ज़हरा वग़ैरह, यह सारी ईदें किसी वाकेए की तरफ़ इशारा करती हैं। ईद उल फि़त्रः पहली शव्वाल को एक महीने के रोज़े पूरे करने का शुकराना और फि़तरा निकाल कर ग़रीबों की ईद का सामान फ़राहम करने का ज़रिया है। ईदे क़ुरबानः 10 जि़लहिज्जा हज़रत इसमा
अलामाते ज़हूरे महदी (अ0) के मोताअल्लिक़ मासूमीन के इरशादात
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आलामाते ज़हूरे महदी (अ0) के मोताअल्लिक़ अरबाबे इस्मत के इरशादात इमाम महदी (अ0) का ज़हूर होगा। मग़रिब व मशरिक पर आपकी हुकूमत होगी। ज़मीन ख़ुद बा ख़ुद तमाम दफ़ीने (ज़मीन के ख़ज़ाने) उगल देगी। दुनिया की कोई एसी ज़मीन न बाक़ी रहेगी जिसको आप आबाद न कर दें। अलामात ज़हूर में यह चन्द है-
इन्तेज़ार की हक़ीक़त
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इन्तेज़ार के विभिन्न अर्थ व मअनी वर्णन किये गए हैं, लेकिन इस शब्द पर गौर व फिक्र के ज़रिये इसके अर्थ की वास्तविक्ता तक पहुँचा जा सकता है। इन्तेज़ार का अर्त किसी के लिए आँखे बिछाना है। यह इन्तेज़ार शर्तें पूरी करने व रास्ता तैयार करने के लिहाज़ से महत्व पैदा करता है और इस से बहुत से नतीजे ज़ाहिर होते हैं। इन्तेज़ार सिर्फ़ रुह से संबंधित और आंतरिक हालत का नाम नहीं है, बल्कि
इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियाँ
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मासूम इमामों की हदीसों और रिवायतों में ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की बहुत सी ज़िम्मेदारियों का वर्णन हुआ हैं। हम यहाँ पर उन में से कुछ महत्वपूर्ण निम्न लिखित ज़िम्मेदारियों का उल्लेख कर रहे हैं इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियाँ
उमूमी सफ़ीरों के नाम
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मुनासिब मालूम होता है कि उन सुफ़रा के अस्मा भी दर्ज कर दिये जायें जो नव्वाबे ख़ास के ज़रिये और सिफ़ारिश से इमाम के हुक्म से मुमालिके महरूसा मख़सूसा में इमाम अलैहिस्सलाम का काम करते और हज़रत की ख़िदमत में हाज़िर होते रहते थे। (1) बग़दाद से हाजिज़, बिलाली, अत्तार (2) कुफ़े से आसमी (3) अहवान से मुहम्मद बिन इब्राहीम बिन मेहरयार (4) हमदान से मुहम्मद इब्ने सालेह
इमाम महदी अलैहिस्सलाम का वुजूद, ग़ैबत, और ज़हूर क़ुरआने मजीद की रौशनी में
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हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के वुजूद, ग़ैबत, तूले उम्र और आपके ज़हूर के बाद तमाम अदयान के एक हो जाने से मुताअल्लिक़ 94 आयतें क़ुरआने मजीद में मौजूद हैं। जिनमें से अकसर को दोनों फ़रीक़ ने तसलीम किया है। इसी तरह बेशुमार ख़ुसूसी अहादीस भी हैं। तफ़सील के लिए मुलाहेज़ा हो ग़ायतुल मक़सूद व ग़ायतुल मराम अल्लामा हाशिम बहरानी व यानाबि उल मवद्दाता।
ग़ैबत सुग़रा व कुबरा और आपके सुफ़रा
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आपकी ग़ैबत की दो हैसियतें थीं। एक सुग़रा और दूसरी कुबरा। ग़ैबते सुग़रा की मुद्दत 69 साल थी। उसके बाद ग़ैबते कुबरा शुरू हो गई। ग़ैबते सुग़रा केज़माने में आपका एक नायबे ख़ास होता था, जिसके ज़ेरे एहतमाम हर क़िस्म का निज़ाम चलता था। सवाल व जवाब ,ख़ुम्स व ज़क़ात और दिगर मराहिल उसी के वास्ते से तै होते थे। ख़ुसूसी मक़ामात पर उसी के ज़रिये और सिफ़ारिश से सुफ़रा मुक़र्र किये जाते थे। हज़रत उस्मान बिन सईद अमरी