आप का जन्म रजब मास की 13वी तारीख को हिजरत से 23वर्ष पूर्व मक्का शहर के विश्व विख्यात व अतिपवित्र स्थान काबे मे हुआ था। आप अपने माता पिता के चौथे पुत्र थे।
हज़रत फातेमा मासूमा (अ.स) हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स) की बेटीयो (फातेमा, ज़ैनब और उम्मेकुलसूम) से नकल करती है और इस हदीस की सनद का सिलसिला हज़रत ज़हरा (स.अ) पर खत्म होता हैः حدثتنی فاطمة و زینب و ام کلثوم بنات موسی بن جعفر قلن : ۔۔۔ عن فاطمة بنت رسول الله صلی الله علیه و آله وسلم و رضی عنها : قالت : ”انسیتم قول رسول الله صلی الله علیه و آله و سلم یوم غدیر خم ، من کنت مولاه فعلی مولاه و قوله صلی الله علیه و آله وسلم ، انت منی بمنزلة هارون من موسی“
वे एक ऐसी महान हस्ती थीं जिन्होंने इतिहास के एक कालखंड में अपने ऐतिहासिक पलायन से मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़े गौरव का मार्ग प्रशस्त किया। ये हस्ती इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की सुपुत्री और हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की वफ़ादार बहन हज़रत फ़ातेमा मासूमा (अ) हैं। इमाम रज़ा के बाद, इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की संतान में हज़रत मासूमा (अ) का स्थान सबसे उच्च है। इस चयनित महिला की महानता के लिए इतना कहना ही पर्याप्त है कि वे सदैव ही इमामों और इस्लाम धर्म के नेताओं के आ
ईश्वरीय दायित्व के उचित ढंग से निर्वाह के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों में से प्रत्येक ने अपने काल में हर कार्य के लिए तार्किक और प्रशंसनीय नीति अपनाता था ताकि ईश्वरीय मार्गदर्शन जैसे अपने दायित्व का निर्वाह उचित ढंग से किया जा सके। इन महापुरूषों के जीवन में ईश्वर पर केन्द्रियता उनका मूल मंत्र रही। इस प्रकार न्याय को लागू करने, ईश्वर के बिना किसी अन्य की दासता से मनुष्यों को मुक्ति दिलाने और व्यक्तिगत एवं समाजिक संबन्धों में सुधार जैसे विषयों पर उनका विशेष ध्यान था।
इमाम यानी ज़मीन पर ख़ुदा का ख़लीफ़ा, सारे मौजूदात की हयात और पूरी कायनात का सुकून वुजूदे इमाम से बर क़रार है। वह ज़ैनब (स) जो ख़ानदाने इमामत में पली हो और मकतबे अली (अ) में तरबीयत पाई हो, वह इमामत की बुलंदी और मंसब की अज़मत से ख़ूब वाक़िफ़ और इमाम के बारे में अपने फ़रायज़ से कमा हक़्क़हू बा ख़बर है। इन बातों पर तारीख़ गवाह है। आप अपने वालिद हज़रत अली (अ) की ज़िन्द
पैग़म्बर और ईश्वरीय मार्गदर्शक, सर्वसमर्थ व महान ईश्वर की असीम कृपा के प्रतीक और विश्व में उसकी दया एवं मार्गदर्शन के स्रोत हैं। वे इतिहास के अंधेरे में प्रज्वलित दीप की भांति चमके और उन्होंने वातावरण को प्रकाशमयी किया ताकि मनुष्य अज्ञानता के अंधेरे से निकल कर सच्चाई का मार्ग देख सके। अभी भी इन ईश्वरीय दूतों के मार्गदर्शन का प्रकाश सच्चाई की खोज में रहने वाले हृदयों को उज्जवल बनाए हुए है।
इराक मे दफ्न बुज़ुर्ग शख्सीयात मे से एक जनाबे रूशैद हजरी है कि जो इमाम अली अलैहिस्सलाम के असहाबे खास मे से थे और ईमान और अमल के बड़े दरजे पर फाएज थे शायद इसी लिऐ परवरदिगारे आलम ने इराक मे मौजूद असहाबे इमाम मे आपको एक अज़ीम हैसीयत अता की है।