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पवित्र कुरआन - सूरह النبإ - جزء سي ام - सूरह نبأ - पृष्ठ 582

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بسم‌الله
عَمَّ يَتَسَاءَلُونَ ١ عَنِ النَّبَإِ الْعَظِيمِ ٢ الَّذِي هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ ٣ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ٤ ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ٥ أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ مِهَادًا ٦ وَالْجِبَالَ أَوْتَادًا ٧ وَخَلَقْنَاكُمْ أَزْوَاجًا ٨ وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًا ٩ وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ لِبَاسًا ١٠ وَجَعَلْنَا النَّهَارَ مَعَاشًا ١١ وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًا شِدَادًا ١٢ وَجَعَلْنَا سِرَاجًا وَهَّاجًا ١٣ وَأَنْزَلْنَا مِنَ الْمُعْصِرَاتِ مَاءً ثَجَّاجًا ١٤ لِنُخْرِجَ بِهِ حَبًّا وَنَبَاتًا ١٥ وَجَنَّاتٍ أَلْفَافًا ١٦ إِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ كَانَ مِيقَاتًا ١٧ يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًا ١٨ وَفُتِحَتِ السَّمَاءُ فَكَانَتْ أَبْوَابًا ١٩ وَسُيِّرَتِ الْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا ٢٠ إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًا ٢١ لِلطَّاغِينَ مَآبًا ٢٢ لَابِثِينَ فِيهَا أَحْقَابًا ٢٣ لَا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًا وَلَا شَرَابًا ٢٤ إِلَّا حَمِيمًا وَغَسَّاقًا ٢٥ جَزَاءً وِفَاقًا ٢٦ إِنَّهُمْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ حِسَابًا ٢٧ وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا كِذَّابًا ٢٨ وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ كِتَابًا ٢٩ فَذُوقُوا فَلَنْ نَزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا ٣٠
किस चीज़ के विषय में वे आपस में पूछ-गच्छ कर रहे है? (1) उस बड़ी ख़बर के सम्बन्ध में, (2) जिसमें वे मतभेद रखते है (3) कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे। (4) फिर कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे। (5) क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को बिछौना बनाया (6) और पहाड़ों को मेख़े? (7) और हमने तुम्हें जोड़-जोड़े पैदा किया, (8) और तुम्हारी नींद को थकन दूर करनेवाली बनाया, (9) रात को आवरण बनाया, (10) और दिन को जीवन-वृति के लिए बनाया (11) और तुम्हारे ऊपर सात सुदृढ़ आकाश निर्मित किए, (12) और एक तप्त और प्रकाशमान प्रदीप बनाया, (13) और बरस पड़नेवाली घटाओं से हमने मूसलाधार पानी उतारा, (14) ताकि हम उसके द्वारा अनाज और वनस्पति उत्पादित करें (15) और सघन बांग़ भी। (16) निस्संदेह फ़ैसले का दिन एक नियत समय है, (17) जिस दिन नरसिंघा में फूँक मारी जाएगी, तो तुम गिरोह को गिरोह चले आओगे। (18) और आकाश खोल दिया जाएगा तो द्वार ही द्वार हो जाएँगे; (19) और पहाड़ चलाए जाएँगे, तो वे बिल्कुल मरीचिका होकर रह जाएँगे (20) वास्तव में जहन्नम एक घात-स्थल है; (21) सरकशों का ठिकाना है (22) वस्तुस्थिति यह है कि वे उसमें मुद्दत पर मुद्दत बिताते रहेंगे (23) वे उसमे न किसी शीतलता का मज़ा चखेगे और न किसी पेय का, (24) सिवाय खौलते पानी और बहती पीप-रक्त के (25) यह बदले के रूप में उनके कर्मों के ठीक अनुकूल होगा (26) वास्तव में किसी हिसाब की आशा न रखते थे, (27) और उन्होंने हमारी आयतों को ख़ूब झुठलाया, (28) और हमने हर चीज़ लिखकर गिन रखी है (29) "अब चखो मज़ा कि यातना के अतिरिक्त हम तुम्हारे लिए किसी और चीज़ में बढ़ोत्तरी नहीं करेंगे। " (30)