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पवित्र कुरआन - सूरह الشمس - جزء سي ام - सूरह شمس - सूरह ليل - पृष्ठ 595

पाठ सेटिंग्स
फ़ॉन्ट प्रकार
फ़ॉन्ट आकार
फ़ॉन्ट रंग
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फ़ॉन्ट आकार
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البلد 
सूरह شمس  सूरह ليل 
الضحى 
بسم‌الله
وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا ١ وَالْقَمَرِ إِذَا تَلَاهَا ٢ وَالنَّهَارِ إِذَا جَلَّاهَا ٣ وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَاهَا ٤ وَالسَّمَاءِ وَمَا بَنَاهَا ٥ وَالْأَرْضِ وَمَا طَحَاهَا ٦ وَنَفْسٍ وَمَا سَوَّاهَا ٧ فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَاهَا ٨ قَدْ أَفْلَحَ مَنْ زَكَّاهَا ٩ وَقَدْ خَابَ مَنْ دَسَّاهَا ١٠ كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوَاهَا ١١ إِذِ انْبَعَثَ أَشْقَاهَا ١٢ فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ نَاقَةَ اللَّهِ وَسُقْيَاهَا ١٣ فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُمْ بِذَنْبِهِمْ فَسَوَّاهَا ١٤ وَلَا يَخَافُ عُقْبَاهَا ١٥
بسم‌الله
وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰ ١ وَالنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّىٰ ٢ وَمَا خَلَقَ الذَّكَرَ وَالْأُنْثَىٰ ٣ إِنَّ سَعْيَكُمْ لَشَتَّىٰ ٤ فَأَمَّا مَنْ أَعْطَىٰ وَاتَّقَىٰ ٥ وَصَدَّقَ بِالْحُسْنَىٰ ٦ فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْيُسْرَىٰ ٧ وَأَمَّا مَنْ بَخِلَ وَاسْتَغْنَىٰ ٨ وَكَذَّبَ بِالْحُسْنَىٰ ٩ فَسَنُيَسِّرُهُ لِلْعُسْرَىٰ ١٠ وَمَا يُغْنِي عَنْهُ مَالُهُ إِذَا تَرَدَّىٰ ١١ إِنَّ عَلَيْنَا لَلْهُدَىٰ ١٢ وَإِنَّ لَنَا لَلْآخِرَةَ وَالْأُولَىٰ ١٣ فَأَنْذَرْتُكُمْ نَارًا تَلَظَّىٰ ١٤
साक्षी है सूर्य और उसकी प्रभा, (1) और चन्द्रमा जबकि वह उनके पीछे आए, (2) और दिन, जबकि वह उसे प्रकट कर दे, (3) और रात, जबकि वह उसको ढाँक ले (4) और आकाश और जैसा कुछ उसे उठाया, (5) और धरती और जैसा कुछ उसे बिछाया (6) और आत्मा और जैसा कुछ उसे सँवारा (7) फिर उसके दिल में डाली उसकी बुराई और उसकी परहेज़गारी (8) सफल हो गया जिसने उसे विकसित किया (9) और असफल हुआ जिसने उसे दबा दिया (10) समूद ने अपनी सरकशी से झुठलाया, (11) जब उनमें का सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली उठ खड़ा हुआ, (12) तो अल्लाह के रसूल ने उनसे कहा, "सावधान, अल्लाह की ऊँटनी और उसके पिलाने (की बारी) से।" (13) किन्तु उन्होंने उसे झुठलाया और उस ऊँटनी की कूचें काट डाली। अन्ततः उनके रब ने उनके गुनाह के कारण उनपर तबाही डाल दी और उन्हें बराबर कर दिया (14) और उसे उसके परिणाम का कोई भय नहीं (15) साक्षी है रात जबकि वह छा जाए, (1) और दिन जबकि वह प्रकाशमान हो, (2) और नर और मादा का पैदा करना, (3) कि तुम्हारा प्रयास भिन्न-भिन्न है (4) तो जिस किसी ने दिया और डर रखा, (5) और अच्छी चीज़ की पुष्टि की, (6) हम उस सहज ढंग से उस चीज का पात्र बना देंगे, जो सहज और मृदुल (सुख-साध्य) है (7) रहा वह व्यक्ति जिसने कंजूसी की और बेपरवाही बरती, (8) और अच्छी चीज़ को झुठला दिया, (9) हम उसे सहज ढंग से उस चीज़ का पात्र बना देंगे, जो कठिन चीज़ (कष्ट-साध्य) है (10) और उसका माल उसके कुछ काम न आएगा, जब वह (सिर के बल) खड्ड में गिरेगा (11) निस्संदेह हमारे ज़िम्मे है मार्ग दिखाना (12) और वास्तव में हमारे अधिकार में है आख़िरत और दुनिया भी (13) अतः मैंने तुम्हें दहकती आग से सावधान कर दिया (14)