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पवित्र कुरआन - सूरह التين - جزء سي ام - सूरह تين - सूरह علق - पृष्ठ 597

पाठ सेटिंग्स
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الشرح 
सूरह تين  सूरह علق 
القدر 
بسم‌الله
وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ ١ وَطُورِ سِينِينَ ٢ وَهَٰذَا الْبَلَدِ الْأَمِينِ ٣ لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ فِي أَحْسَنِ تَقْوِيمٍ ٤ ثُمَّ رَدَدْنَاهُ أَسْفَلَ سَافِلِينَ ٥ إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَلَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ ٦ فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعْدُ بِالدِّينِ ٧ أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِينَ ٨
بسم‌الله
اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ ١ خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ ٢ اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ ٣ الَّذِي عَلَّمَ بِالْقَلَمِ ٤ عَلَّمَ الْإِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ ٥ كَلَّا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَيَطْغَىٰ ٦ أَنْ رَآهُ اسْتَغْنَىٰ ٧ إِنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ الرُّجْعَىٰ ٨ أَرَأَيْتَ الَّذِي يَنْهَىٰ ٩ عَبْدًا إِذَا صَلَّىٰ ١٠ أَرَأَيْتَ إِنْ كَانَ عَلَى الْهُدَىٰ ١١ أَوْ أَمَرَ بِالتَّقْوَىٰ ١٢ أَرَأَيْتَ إِنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ ١٣ أَلَمْ يَعْلَمْ بِأَنَّ اللَّهَ يَرَىٰ ١٤ كَلَّا لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ لَنَسْفَعًا بِالنَّاصِيَةِ ١٥ نَاصِيَةٍ كَاذِبَةٍ خَاطِئَةٍ ١٦ فَلْيَدْعُ نَادِيَهُ ١٧ سَنَدْعُ الزَّبَانِيَةَ ١٨ كَلَّا لَا تُطِعْهُ وَاسْجُدْ وَاقْتَرِبْ ۩ अनिवार्य सजदा ١٩
साक्षी है तीन और ज़ैतून (1) और तूर सीनीन, (2) और यह शान्तिपूर्ण भूमि (मक्का) (3) निस्संदेह हमने मनुष्य को सर्वोत्तम संरचना के साथ पैदा किया (4) फिर हमने उसे निकृष्टतम दशा की ओर लौटा दिया, जबकि वह स्वयं गिरनेवाला बना (5) सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए कभी न समाप्त होनेवाला बदला है (6) अब इसके बाद क्या है, जो बदले के विषय में तुम्हें झुठलाए? (7) क्या अल्लाह सब हाकिमों से बड़ा हाकिम नहीं हैं? (8) पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया, (1) पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून के एक लोथड़े से (2) पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है, (3) जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी, (4) मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिस वह न जानता था (5) कदापि नहीं, मनुष्य सरकशी करता है, (6) इसलिए कि वह अपने आपको आत्मनिर्भर देखता है (7) निश्चय ही तुम्हारे रब ही की ओर पलटना है (8) क्या तुमने देखा उस व्यक्ति को (9) जो एक बन्दे को रोकता है, जब वह नमाज़ अदा करता है? - (10) तुम्हारा क्या विचार है? यदि वह सीधे मार्ग पर हो, (11) या परहेज़गारी का हुक्म दे (उसके अच्छा होने में क्या संदेह है) (12) तुम्हारा क्या विचार है? यदि उस (रोकनेवाले) ने झुठलाया और मुँह मोड़ा (तो उसके बुरा होने में क्या संदेह है) - (13) क्या उसने नहीं जाना कि अल्लाह देख रहा है? (14) कदापि नहीं, यदि वह बाज़ न आया तो हम चोटी पकड़कर घसीटेंगे, (15) झूठी, ख़ताकार चोटी (16) अब बुला ले वह अपनी मजलिस को! (17) हम भी बुलाए लेते है सिपाहियों को (18) कदापि नहीं, उसकी बात न मानो और सजदे करते और क़रीब होते रहो (19)