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पवित्र कुरआन - सूरह عبس - جزء سي ام - सूरह عبس - पृष्ठ 585

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सूरह عبس 
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بسم‌الله
عَبَسَ وَتَوَلَّىٰ ١ أَنْ جَاءَهُ الْأَعْمَىٰ ٢ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُ يَزَّكَّىٰ ٣ أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنْفَعَهُ الذِّكْرَىٰ ٤ أَمَّا مَنِ اسْتَغْنَىٰ ٥ فَأَنْتَ لَهُ تَصَدَّىٰ ٦ وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ ٧ وَأَمَّا مَنْ جَاءَكَ يَسْعَىٰ ٨ وَهُوَ يَخْشَىٰ ٩ فَأَنْتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ ١٠ كَلَّا إِنَّهَا تَذْكِرَةٌ ١١ فَمَنْ شَاءَ ذَكَرَهُ ١٢ فِي صُحُفٍ مُكَرَّمَةٍ ١٣ مَرْفُوعَةٍ مُطَهَّرَةٍ ١٤ بِأَيْدِي سَفَرَةٍ ١٥ كِرَامٍ بَرَرَةٍ ١٦ قُتِلَ الْإِنْسَانُ مَا أَكْفَرَهُ ١٧ مِنْ أَيِّ شَيْءٍ خَلَقَهُ ١٨ مِنْ نُطْفَةٍ خَلَقَهُ فَقَدَّرَهُ ١٩ ثُمَّ السَّبِيلَ يَسَّرَهُ ٢٠ ثُمَّ أَمَاتَهُ فَأَقْبَرَهُ ٢١ ثُمَّ إِذَا شَاءَ أَنْشَرَهُ ٢٢ كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَا أَمَرَهُ ٢٣ فَلْيَنْظُرِ الْإِنْسَانُ إِلَىٰ طَعَامِهِ ٢٤ أَنَّا صَبَبْنَا الْمَاءَ صَبًّا ٢٥ ثُمَّ شَقَقْنَا الْأَرْضَ شَقًّا ٢٦ فَأَنْبَتْنَا فِيهَا حَبًّا ٢٧ وَعِنَبًا وَقَضْبًا ٢٨ وَزَيْتُونًا وَنَخْلًا ٢٩ وَحَدَائِقَ غُلْبًا ٣٠ وَفَاكِهَةً وَأَبًّا ٣١ مَتَاعًا لَكُمْ وَلِأَنْعَامِكُمْ ٣٢ فَإِذَا جَاءَتِ الصَّاخَّةُ ٣٣ يَوْمَ يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ ٣٤ وَأُمِّهِ وَأَبِيهِ ٣٥ وَصَاحِبَتِهِ وَبَنِيهِ ٣٦ لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ يَوْمَئِذٍ شَأْنٌ يُغْنِيهِ ٣٧ وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ مُسْفِرَةٌ ٣٨ ضَاحِكَةٌ مُسْتَبْشِرَةٌ ٣٩ وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌ ٤٠ تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ ٤١ أُولَٰئِكَ هُمُ الْكَفَرَةُ الْفَجَرَةُ ٤٢
उसने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया, (1) इस कारण कि उसके पास अन्धा आ गया। (2) और तुझे क्या मालूम शायद वह स्वयं को सँवारता-निखारता हो (3) या नसीहत हासिल करता हो तो नसीहत उसके लिए लाभदायक हो? (4) रहा वह व्यक्ति जो धनी हो गया ह (5) तू उसके पीछे पड़ा है - (6) हालाँकि वह अपने को न निखारे तो तुझपर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती - (7) और रहा वह व्यक्ति जो स्वयं ही तेरे पास दौड़ता हुआ आया, (8) और वह डरता भी है, (9) तो तू उससे बेपरवाई करता है (10) कदापि नहीं, वे (आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत है - (11) तो जो चाहे उसे याद कर ले - (12) पवित्र पन्नों में अंकित है, (13) प्रतिष्ठि्त, उच्च, (14) ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है (15) जो प्रतिष्ठित और नेक है (16) विनष्ट हुआ मनुष्य! कैसा अकृतज्ञ है! (17) उसको किस चीज़ से पैदा किया? (18) तनिक-सी बूँद से उसको पैदा किया, तो उसके लिए एक अंदाजा ठहराया, (19) फिर मार्ग को देखो, उसे सुगम कर दिया, (20) फिर उसे मृत्यु दी और क्रब में उसे रखवाया, (21) फिर जब चाहेगा उसे (जीवित करके) उठा खड़ा करेगा। - (22) कदापि नहीं, उसने उसको पूरा नहीं किया जिसका आदेश अल्लाह ने उसे दिया है (23) अतः मनुष्य को चाहिए कि अपने भोजन को देखे, (24) कि हमने ख़ूब पानी बरसाया, (25) फिर धरती को विशेष रूप से फाड़ा, (26) फिर हमने उसमें उगाए अनाज, (27) और अंगूर और तरकारी, (28) और ज़ैतून और खजूर, (29) और घने बाग़, (30) और मेवे और घास-चारा, (31) तुम्हारे लिए और तुम्हारे चौपायों के लिेए जीवन-सामग्री के रूप में (32) फिर जब वह बहरा कर देनेवाली प्रचंड आवाज़ आएगी, (33) जिस दिन आदमी भागेगा अपने भाई से, (34) और अपनी माँ और अपने बाप से, (35) और अपनी पत्नी और अपने बेटों से (36) उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन ऐसी पड़ी होगी जो उसे दूसरों से बेपरवाह कर देगी (37) कितने ही चेहरे उस दिन रौशन होंगे, (38) हँसते, प्रफुल्लित (39) और कितने ही चेहरे होंगे जिनपर उस दिन धूल पड़ी होगी, (40) उनपर कलौंस छा रही होगी (41) वहीं होंगे इनकार करनेवाले दुराचारी लोग! (42)