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पवित्र कुरआन - सूरह الفجر - جزء سي ام - सूरह فجر - सूरह بلد - पृष्ठ 594

पाठ सेटिंग्स
फ़ॉन्ट प्रकार
फ़ॉन्ट आकार
फ़ॉन्ट रंग
फ़ॉन्ट प्रकार
फ़ॉन्ट आकार
फ़ॉन्ट रंग
الفجر 
सूरह بلد 
الشمس 
يَقُولُ يَا لَيْتَنِي قَدَّمْتُ لِحَيَاتِي ٢٤ فَيَوْمَئِذٍ لَا يُعَذِّبُ عَذَابَهُ أَحَدٌ ٢٥ وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُ أَحَدٌ ٢٦ يَا أَيَّتُهَا النَّفْسُ الْمُطْمَئِنَّةُ ٢٧ ارْجِعِي إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةً مَرْضِيَّةً ٢٨ فَادْخُلِي فِي عِبَادِي ٢٩ وَادْخُلِي جَنَّتِي ٣٠
بسم‌الله
لَا أُقْسِمُ بِهَٰذَا الْبَلَدِ ١ وَأَنْتَ حِلٌّ بِهَٰذَا الْبَلَدِ ٢ وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَ ٣ لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ فِي كَبَدٍ ٤ أَيَحْسَبُ أَنْ لَنْ يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌ ٥ يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًا لُبَدًا ٦ أَيَحْسَبُ أَنْ لَمْ يَرَهُ أَحَدٌ ٧ أَلَمْ نَجْعَلْ لَهُ عَيْنَيْنِ ٨ وَلِسَانًا وَشَفَتَيْنِ ٩ وَهَدَيْنَاهُ النَّجْدَيْنِ ١٠ فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَ ١١ وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْعَقَبَةُ ١٢ فَكُّ رَقَبَةٍ ١٣ أَوْ إِطْعَامٌ فِي يَوْمٍ ذِي مَسْغَبَةٍ ١٤ يَتِيمًا ذَا مَقْرَبَةٍ ١٥ أَوْ مِسْكِينًا ذَا مَتْرَبَةٍ ١٦ ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ ١٧ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ ١٨ وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا هُمْ أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ ١٩ عَلَيْهِمْ نَارٌ مُؤْصَدَةٌ ٢٠
वह कहेगा, "ऐ काश! मैंने अपने जीवन के लिए कुछ करके आगे भेजा होता।" (24) फिर उस दिन कोई नहीं जो उसकी जैसी यातना दे, (25) और कोई नहीं जो उसकी जकड़बन्द की तरह बाँधे (26) "ऐ संतुष्ट आत्मा! (27) लौट अपने रब की ओर, इस तरह कि तू उससे राज़ी है वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा। - (28) अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा (29) और प्रवेश कर मेरी जन्नत में।" (30) सुनो! मैं क़सम खाता हूँ इस नगर (मक्का) की - (1) हाल यह है कि तुम इसी नगर में रह रहे हो - (2) और बाप और उसकी सन्तान की, (3) निस्संदेह हमने मनुष्य को पूर्ण मशक़्क़त (अनुकूलता और सन्तुलन) के साथ पैदा किया (4) क्या वह समझता है कि उसपर किसी का बस न चलेगा? (5) कहता है कि "मैंने ढेरो माल उड़ा दिया।" (6) क्या वह समझता है कि किसी ने उसे देखा नहीं? (7) क्या हमने उसे नहीं दी दो आँखें, (8) और एक ज़बान और दो होंठ? (9) और क्या ऐसा नहीं है कि हमने दिखाई उसे दो ऊँचाइयाँ? (10) किन्तु वह तो हुमककर घाटी में से गुजंरा ही नहीं और (न उसने मुक्ति का मार्ग पाया) (11) और तुम्हें क्या मालूम कि वह घाटी क्या है! (12) किसी गरदन का छुड़ाना (13) या भूख के दिन खाना खिलाना (14) किसी निकटवर्ती अनाथ को, (15) या धूल-धूसरित मुहताज को; (16) फिर यह कि वह उन लोगों में से हो जो ईमान लाए और जिन्होंने एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की , और एक-दूसरे को दया की ताकीद की (17) वही लोग है सौभाग्यशाली (18) रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयातों का इनकार किया, वे दुर्भाग्यशाली लोग है (19) उनपर आग होगी, जिसे बन्द कर दिया गया होगा (20)