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इस्लामी विरासत के क़ानून के उद्देश्य

इस्लामी विरासत का क़ानून मात्र सम्पत्ति वितरण का क़ानून नहीं है बल्कि इससे अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति भी होती है जो परिवार एवं समाज के लिए आवश्यक हैं। ये मुख्यतः तीन हैं :

(1)सम्पत्ति के प्रवाह को रुकने से बचाना

किसी भी समाज में सुख, शान्ति एवं समृद्धि तभी संभव है जब उसमें सम्पत्ति सदैव प्रवाहित होती रहे और कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में सीमित होकर न रह जाए।

इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था इस बात को सुनिश्चित करती है कि समाज में सम्पत्ति सदैव प्रवाह में रहे। यही कारण है कि जब भी इस्लाम को पूर्ण रूप से किसी समाज में स्थापित किया गया है वहां सुख, शान्ति और समृद्धि के द्वार खुल गए हैं और इसका स्वाद हर किसी को चखने को मिला है।

सम्पत्ति के संचय से जहां एक ओर इसका वितरण असमान हो जाता है और ग़रीबी फैलती है, वहीं दूसरी ओर आदमी में लोभ और कंजूसी की प्रवृत्ति भी उत्पन्न होती है। पवित्र कु़रआन में ईश्वर ने ऐसा करने वालों को कठोर दंड की चेतावनी दी है।

आज हमारा पूरा समाज इसी बीमारी से ग्रस्त है और यही कारण है कि जिन लोगों के पास सबसे अधिक धन है वही सबसे अधिक लोभी भी हैं। और उन्हें इसकी बिल्कुल भी चिंता नहीं होती की उन्हीं के समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भुखमरी के कारण आत्महत्या करने पर विवश है।

पूंजीवाद इसी असमान आर्थिक व्यवस्था का प्रचारी है और इसी आधार पर समाज का निर्माण करना चाहता है।

इस्लाम इसका विरोध करता है और इसे पूर्ण रूप से समाप्त करना चाहता है। इसी कारण इसमें ऐसा प्रावधान है कि धन और सम्पत्ति संचित न होने पाए और इसका प्रवाह सुनिश्चित रहे। ज़कात (अनिवार्य धन-दान), सदक़ात (स्वैच्छिक धन-दान) और विरासत का क़ानून इसी प्रावधान का अंश है।

(2)ये स्मरण कराना की समस्त सम्पत्ति का वास्तविक मालिक ईश्वर है

यह समस्त संसार उसी की सम्पत्ति है जिसने इसकी रचना की है और वही यथार्थ में इसका स्वामी भी है। मनुष्य अनभिज्ञता में अपने आपको अपनी सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी समझ बैठा है और उस पर अपना एकाधिकार समझने लगा है।

वास्तविकता यह है कि मनुष्य का सम्पत्ति पर अधिकार अस्थाई है और वह मात्र एक प्रतिशासक (Regent) के रूप में है। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका यह अधिकार समाप्त हो जाता है और यह उसके वास्तविक स्वामी पर निर्भर करता है कि अब वो उस सम्पत्ति का स्वामित्व किसे प्रदान करता है।

इस्लामी विरासत का क़ानून इसी सत्य का स्मरण कराता है। मृतक की सम्पत्ति को किसमें और कितने लोगों में बंटना है ये तय करना ईश्वर का अधिकार है और मनुष्य को इससे असंतुष्टि का, या इस पर आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है।

(3) आदमी को संतोष दिलाना किमृत्यु के पश्चात् उसकी सम्पत्ति विवाद का कारण नहीं बनेगी

जब सम्पत्ति का वितरण ईश्वरीय निर्देशानुसार होगा तो न तो किसी को आपत्ति होगी और न ही सम्पत्ति का विवाद परिवार के विघटन का कारण बनेगा। यह विश्वास जीवन में भी आदमी के संतोष का कारण बनता है और मृत्यु के समय भी उसे बहुत से कष्टों से मुक्ति दिलाता है।

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किसी व्यक्ति के धन-सम्पत्ति के वितरण के उपरोक्त, ‘विरासतऔरवसीयतके इस्लामी क़ानून, उस व्यक्ति की मौत के बाद लागू होते हैं। इसके साथ, इस्लामी शरीअत का एक और नियमहिबाभी है जो किसी व्यक्ति के जीवन में ही लागू हो जाता है। इसके अनुसार, किसी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने जीवन में ही अपने धन-सम्पत्ति की मिल्कियत, पूरी या अंश में किसी भी व्यक्ति को (चाहे वह रिश्तेदार हो या न हो) या किसी संस्था को दे दे और उन्हें उसका क़ानूनी मालिक बना दे। इस क़ानूनी अधिकार के बावजूद, इस्लाम नैतिक स्तर पर यह पसन्द करता और इसकी शिक्षा भी देता है कि कोई व्यक्ति हिबा के क़ानूनी प्रावधान को इस्तेमाल करके वारिसों को अपने धन-सम्पत्ति से बिल्कुल वंचित (महरूम) न कर दे। वास्तव में, हिबा की क़ानूनी गुंजाइश कुछ असाधारण परिस्थितियों के लिए रखी गई है, जो किसी व्यक्ति को कुछ विशेष व असामान्य अवस्थाओं में पेश आ सकती हैं


source : http://hamarianjuman.blogspot.com
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